बस्तर पंडुम महोत्सव में नक्सल प्रभावित सुकमा के मूर्तिकार की मूर्तियां लोगों को कर रहीं आकर्षित

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दंतेवाड़ा। जिला मुख्यालय में आयोजित बस्तर पंडुम 2025 महोत्सव में अंदरूनी इलाकों के कलाकारों के लिए एक अच्छा प्लेटफॉर्म बन रहा है। यहां एक कलाकार की बनाई 2 मूर्तियां लोगों को आकर्षित कर रहीं हैं। साइकिल की खराब चेन, साइकिल दुकान में ही खराब पड़े लोहे के छरें और नट-बोल्ट एवं जंगल के पेड़ों से निकलने वाले गोंद जैसी चीजों से एक बुजुर्ग कलाकार ने मां-बेटे की मूर्ति बना दी। जंगल के पेड़ों से निकलने वाले गोंद का इस्तेमाल से नट-बोल्ट को चिपकाकर मूर्ति को आकार दिया गया है। सुकमा जिले के नक्सल प्रभावित छिंदगढ़ के निवासी मूर्तिकार लुन्दू बघेल उम्र 60 वर्ष ने 3 महीने की कड़ी मेहनत से इन दोनों मूर्तियों को बनाया है।
मूर्तिकार लुन्दू बघेल ने बताया कि बस्तर में महिलाओं के श्रंगार के आभूषण बहुत प्रचलित हैं। साथ ही महिलाओं को श्रृंगार का बड़ा शौक रहता है। बस्तर में अभी महुआ, इमली और टोरा का सीजन है। महिलाएं अपने बच्चे और अपने परिवार के साथ सुबह-सुबह जंगलों में वनोपज एकत्रित करने जाती हैं। मां और बेटे के प्यार और उनके दिनचर्या को ही मूर्ति के रूप में उकेरा गया है। उन्होने बताया कि यदि किसी महिला की मूर्ति बनानी हो तो साड़ी, श्रृंगार, बाल, समेत अन्य चीजों का भी ध्यान रखना होता है। अगर ये सब लोहे, चेन, सिक्कों और नट-बोल्ट से बनाया जाए तो और ज्यादा ध्यान और समय लगता है। न्होने बताया कि मूर्ति के लिए पहले कागज से ढांचा तैयार किया, इसके बाद गोंद की एक मोटी परत चढ़ाई। साथ ही भूरे रंग का पेंट किया और मूर्ति तैयार की। मूर्ति बनाने में किसी भी तरह की मशीन या फिर आधुनिक यंत्रों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। लुन्दू का कहना है कि वह किसान है, पिछले 10 सालों से शौकिया तौर पर मूर्तियां बना रहा है। मां-बेटे की ये मूर्ति उसकी अब तक की बनाई गई मूर्तियों में सबसे अच्छी है। उन्होने कहा कि इसे बेचने का कोई इरादा नहीं है। हां, अगर एक-एक मूर्ति के 20-30 हजार रुपए मिलते हैं तो बेचने के लिए सोच सकता है।

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